
Supreme Court issues new Guidelines for Digital News Publishers: Aam Aadmi Aur Creators Par Kya Hoga Asar?
हाल ही में, Supreme Court issues new guidelines for digital news publishers, जिसके बाद से पूरे भारत के मीडिया प्लेटफॉर्म्स, YouTubers और कंटेंट क्रिएटर्स के बीच एक बड़ी चर्चा शुरू हो गई है। अगर आप इंटरनेट पर न्यूज़ पढ़ते हैं, वीडियो देखते हैं, या खुद कोई भी जानकारी वाला कंटेंट बनाते हैं, तो यह लेटेस्ट अपडेट आपके लिए बहुत ज़रूरी है।
डिजिटल दुनिया में फेक न्यूज़ (Fake News) और भ्रामक जानकारी का तेज़ी से फैलना आज के समय की सबसे बड़ी समस्या बन गया है। इसी भ्रामक जानकारी को कंट्रोल करने के लिए Central Govt और हमारी अदालतें लगातार कड़े कदम उठा रही हैं।
इस स्पेशल आर्टिकल में हम आपको बिल्कुल आसान भाषा में समझाएंगे कि आखिर यह पूरा मामला क्या है। हम गहराई से जानेंगे कि भारत के आम आदमी (Common Man), डिजिटल न्यूज़ पोर्टल्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की आज़ादी पर इन नए नियमों का क्या सीधा असर पड़ेगा।
Central Govt के IT Rules 2026 और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने यह बिल्कुल साफ कर दिया है कि इंटरनेट पर अब कुछ भी बिना सोचे-समझे पब्लिश करना कानूनी तौर पर भारी पड़ सकता है। तो चलिए, बिना किसी देरी के इस पूरे मामले के हर पहलू को डीटेल में समझते हैं।
Kyon Supreme Court issues new Rules for Digital Media in 2026?
भारत में आज करोड़ों लोग अपने स्मार्टफोन पर हर पल न्यूज़ पढ़ते हैं। ऐसे में एकदम सही और सच्ची जानकारी उन तक पहुँचे, यह सुनिश्चित करना सरकार की एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है। पिछले कुछ सालों में WhatsApp, Facebook, YouTube और X (Twitter) पर फेक न्यूज़ की बाढ़ सी आ गई है, जिसने कई बार दंगे जैसी स्थिति भी पैदा की है।
इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए Supreme Court issues new directives ताकि एक सही बैलेंस (Balance) बनाया जा सके। एक तरफ देश की सुरक्षा को मज़बूत करना और फेक न्यूज़ पर पूरी तरह लगाम लगाना है, तो दूसरी तरफ देश के हर आम नागरिक की Freedom of Speech (बोलने की आज़ादी) को भी बिना नुकसान पहुँचाए बचाकर रखना है।
मार्च 2026 में हुई एक बड़ी सुनवाई के दौरान, Supreme Court के चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि फेक न्यूज़ किसी भी देश की बुनियाद को नुकसान पहुँचा सकती है। लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया कि सरकार को यह तय करने का एकमात्र ‘अंतिम अधिकारी’ नहीं बनाया जा सकता कि क्या सच है और क्या झूठ।
“हमें एक ऐसा मज़बूत सिस्टम चाहिए जो आम आदमी की अभिव्यक्ति की आज़ादी को बिना कुचले, देश को फेक न्यूज़ के ज़हर से बचा सके।” – सुप्रीम कोर्ट की ऑब्जरवेशन (मार्च 2026)
आपको बता दें कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2024 में सरकार के Fact Checking Unit (FCU) को असंवैधानिक (Unconstitutional) बताकर पूरी तरह रद्द कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। इसी लंबी कानूनी खींचतान के बीच सरकार ने Draft IT Rules 2026 पेश किए हैं, जिसने पुराने नियमों को अब और भी ज्यादा सख्त बना दिया है।
The Complete Timeline: 2021 से 2026 तक डिजिटल न्यूज़ के नियम कैसे बदले?
डिजिटल मीडिया को कानूनी रूप से रेगुलेट करने की यह कहानी कोई आज की नहीं है। इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। यहाँ देखिए इस पूरे विवाद की टाइमलाइन:
- 2021 की शुरुआत: सरकार ने पहली बार Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 लागू किए। पहली बार OTT प्लेटफॉर्म्स और डिजिटल न्यूज़ पोर्टल्स को एक कानूनी दायरे में लाया गया।
- 2023 में संशोधन: सरकार ने पुराने नियमों में कुछ बदलाव किए और एक ‘Fact Checking Unit’ (FCU) बनाने की बात कही, जिसका काम सरकार के खिलाफ चल रही फेक न्यूज़ को तुरंत इंटरनेट से हटवाना था।
- 2024 का ऐतिहासिक कोर्ट ऑर्डर: बॉम्बे हाई कोर्ट ने FCU को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह Article 14 और 19 (Freedom of Speech) का सीधा उल्लंघन है। सरकार अकेले सच का फैसला नहीं कर सकती।
- 2025 की सख्ती: ऑनलाइन कंटेंट में रातों-रात बढ़ते Deepfakes और AI (Artificial Intelligence) के गलत इस्तेमाल को देखते हुए और कड़े नियम ड्राफ्ट किए गए।
- 2026 के लेटेस्ट नियम: मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है और सरकार ने Draft IT (Digital Code) Rules 2026 पेश कर दिए हैं। नए नियमों के तहत अब किसी भी भ्रामक कंटेंट को हटाने का समय 36 घंटे से घटाकर सिर्फ 2-3 घंटे कर दिया गया है।
इस पूरी टाइमलाइन से यह साफ पता चलता है कि सरकार भारत की डिजिटल दुनिया को क्लीन रखने के लिए पूरी तरह एक्शन मोड में आ चुकी है।
Supreme Court issues new Directives: YouTubers aur Influencers Ke Liye Naye Niyam
जब से Supreme Court issues new guidelines regarding digital media, इसका सबसे बड़ा और सीधा झटका उन इंडिपेंडेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को लगा है जो अब तक पूरी तरह आज़ाद थे। अब तक सिर्फ बड़े न्यूज़ चैनल्स और रजिस्टर्ड पोर्टल्स ही इन सख्त नियमों के दायरे में आते थे।
लेकिन नए ड्राफ्ट नियमों (Draft IT Rules 2026) के तहत स्थिति बिल्कुल बदल गई है। अगर आप रेगुलर बेसिस पर न्यूज़, राजनीति, या करंट अफेयर्स पर वीडियो बनाते हैं और आपका एक बड़ा दर्शक वर्ग है, तो आपको भी अब ‘Publisher’ (पब्लिशर) माना जा सकता है। इसका सीधा मतलब है कि आपको भी वही Code of Ethics पूरी तरह फॉलो करना होगा जो आज एक बड़े नेशनल न्यूज़ चैनल को करना पड़ता है।
1. AI-Generated Content (Deepfake) Labeling
आजकल AI का इस्तेमाल करके किसी की भी फेक वीडियो या आवाज़ (ऑडियो) कुछ ही मिनटों में बना दी जाती है। नए नियमों के मुताबिक, अगर कोई पब्लिशर या इंडिपेंडेंट क्रिएटर AI का इस्तेमाल करके कोई भी कंटेंट बनाता है, तो उसे उस वीडियो या फोटो पर साफ शब्दों में एक ‘Label’ लगाना होगा कि यह कंटेंट पूरी तरह AI द्वारा जनरेटेड है। इस लेबल को छुपाने या हटाने की कोशिश करने पर पब्लिशर पर भारी क्रिमिनल पेनाल्टी लग सकती है।
2. Takedown Timeline Reduction
पहले के नियमों में, अगर सरकार या अदालत किसी आपत्तिजनक कंटेंट को हटाने का आदेश देती थी, तो प्लेटफॉर्म्स (जैसे YouTube या X) के पास उसे हटाने के लिए 36 घंटे का लंबा समय होता था। अब इस समय सीमा को तेजी से घटाकर केवल 2 से 3 घंटे करने का प्रस्ताव है। यानी कोई भी फेक न्यूज़ वायरल होने से पहले ही उसे जड़ से ब्लॉक कर दिया जाएगा।
3. Grievance Redressal Mechanism
हर न्यूज़ पब्लिशर को अपनी वेबसाइट या यूट्यूब चैनल के विवरण में एक ‘Grievance Officer’ (शिकायत अधिकारी) की पूरी जानकारी (नाम और ईमेल) देनी होगी। अगर किसी भी दर्शक को कंटेंट से दिक्कत है या लगता है कि जानकारी गलत है, तो वह सीधे इस अधिकारी से शिकायत कर सकता है। नियमों के अनुसार 15 दिन के अंदर उस शिकायत का समाधान करना बिल्कुल अनिवार्य होगा।
Safe Harbor Principle Aur Section 79: Tech Companies Ki Zimmedari
भारत की डिजिटल दुनिया की कानूनी बारीकियों को गहराई से समझने के लिए ‘Safe Harbor’ (सेफ हार्बर) के नियम को समझना बहुत आवश्यक है। Information Technology Act, 2000 का सेक्शन 79 बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों जैसे Facebook, X, YouTube और Instagram को एक विशेष कानूनी कवच प्रदान करता है।
सरल शब्दों में, अगर कोई यूजर (जैसे आप या मैं) फेसबुक पर कोई गलत या भड़काऊ पोस्ट करता है, तो पुलिस सीधे फेसबुक के मालिक को गिरफ्तार नहीं कर सकती। कानून यह मानता है कि प्लेटफार्म सिर्फ एक ‘बिचौलिया’ (Intermediary) है, जो केवल लोगों को अपनी बात रखने की एक जगह दे रहा है।
लेकिन सरकार और कोर्ट ने महसूस किया कि यह ‘सेफ हार्बर’ का कवच इन बड़ी टेक कंपनियों को बेहद लापरवाह बना रहा है। जब भी देश में दंगे भड़काने वाली फेक न्यूज़ वायरल होती थी, तो ये विदेशी कंपनियां यह कहकर हाथ खड़े कर देती थीं कि “हम तो सिर्फ एक प्लेटफार्म हैं, हमारा कंटेंट पर कोई कंट्रोल नहीं है।”
जब से Supreme Court issues new and strict observations, इन कंपनियों की जवाबदेही (Accountability) पूरी तरह तय कर दी गई है। अगर सरकार या कोर्ट किसी भ्रामक या गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने का लीगल आदेश देती है, तो प्लेटफार्म को निर्धारित घंटों के भीतर उसे हर हाल में डिलीट करना होगा। अगर प्लेटफार्म ऐसा करने में विफल रहता है, तो उसका यह ‘सेफ हार्बर’ वाला कानूनी कवच तुरंत छिन जाएगा और कंपनी पर सीधे तौर पर मुकदमा दर्ज किया जा सकेगा।
Aam Aadmi (Common Man) Par Iska Kya Asar Hoga?
Central Govt की हर नई योजना, कानून और फैसले का असर सीधे देश की आम जनता पर पड़ता है। आम आदमी (All India Citizens) के मन में इस वक्त कई सवाल हैं कि इन नए डिजिटल नियमों से उनके जीवन पर क्या फायदा या नुकसान होगा। आइए इसे आसान पॉइंट्स में समझते हैं:
- सही जानकारी मिलेगी (Benefit of Truth): इंटरनेट पर आए दिन सरकारी योजनाओं को लेकर फेक मैसेज वायरल होते हैं। जैसे “फ्री में 5000 रुपये मिल रहे हैं, इस लिंक पर क्लिक करें”। ऐसे ढेरों स्कैम मैसेजेस पर अब सख्त लगाम लगेगी। आम नागरिक को सिर्फ वेरिफाइड और सही जानकारी ही मिलेगी, जिससे उनके पैसे और डेटा दोनों सुरक्षित रहेंगे।
- प्राइवेसी और सुरक्षा (Safety from Deepfakes): अगर कोई हैकर किसी आम इंसान की फोटो का गलत इस्तेमाल करके AI डीपफेक बनाता है, तो नए नियमों के तहत सोशल मीडिया कंपनियों को तुरंत वह आपत्तिजनक कंटेंट हटाना होगा। यह आम जनता की इज़्ज़त और प्राइवेसी के लिए एक बहुत बड़ा और मज़बूत सुरक्षा कवच है।
- बोलने की आज़ादी का डर: कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह डर भी है कि इन कड़े नियमों की आड़ में सरकार की आलोचना करने वाले असली मुद्दों को भी ‘फेक न्यूज़’ बताकर हटाया जा सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कह दिया है कि इन नियमों का इस्तेमाल किसी भी तरह की कॉमेडी, मीम या सरकार की जायज़ आलोचना को दबाने के लिए बिल्कुल नहीं किया जा सकता।
Expert’s Take: Yelklo.com Senior Journalist Ki Rai
बतौर एक सीनियर जर्नलिस्ट, मैंने अपने करियर के पिछले एक दशक में भारतीय मीडिया को पारंपरिक अख़बारों से शिफ्ट होकर पूरी तरह डिजिटल स्क्रीन पर आते हुए देखा है। जब मैं ग्राउंड रिपोर्टिंग करता हूँ, तो मुझे अक्सर ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जो WhatsApp पर आए किसी भी रैंडम मैसेज को आँख बंद करके सच मान लेते हैं।
हाल ही में, मैं एक गाँव में रिपोर्टिंग कर रहा था जहाँ अचानक एक फेक न्यूज़ फैल गई कि ‘सरकार ने फ्री राशन मिलना तुरंत बंद कर दिया है’। इस एक फेक मैसेज ने चंद मिनटों में पूरे इलाके में भारी पैनिक पैदा कर दिया। उसी दिन मुझे ज़मीनी स्तर पर यह समझ आया कि डिजिटल न्यूज़ को सख्ती से रेगुलेट करना आज के समय में कितना ज़्यादा ज़रूरी है।
हालांकि, जब Supreme Court issues new orders to balance this, तो एक सच्चे पत्रकार के तौर पर मुझे थोड़ी राहत भी मिलती है और साथ ही थोड़ी चिंता भी होती है। राहत इसलिए क्योंकि इंटरनेट पर फर्जी न्यूज़ फैलाने वाले वो सैंकड़ों पोर्टल्स बंद होंगे, जो असली पत्रकारों की दिन-रात की मेहनत को खराब करते हैं और समाज में नफरत फैलाते हैं।
लेकिन चिंता इस बात की है कि भविष्य में ‘Fake News’ तय करने का असली पावर किसके पास होगा? अगर यह ताकत सिर्फ और सिर्फ सरकार के पास रहेगी, तो इसका गलत राजनीतिक इस्तेमाल भी हो सकता है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का बीच में दखल देना यहाँ सबसे सटीक और सही कदम है, जो यह पक्का करेगा कि देश में कानून का राज चले, न कि किसी की मनमर्जी का।
Online Apply & Document Requirements for New Digital Publishers
अगर आप खुद का एक नया डिजिटल न्यूज़ पोर्टल शुरू कर रहे हैं या एक बहुत बड़े मुकाम पर पहुँच चुके YouTuber हैं, तो आपको Information and Broadcasting (I&B) Ministry के बनाए नियमों का पूरी तरह पालन करना होगा। राहत की बात यह है कि सरकार ने यह पूरी प्रक्रिया काफी हद तक ऑनलाइन कर दी है।
Registration Process (Online Apply Kaise Karein):
- सबसे पहले आपको अपने डिजिटल प्लेटफार्म की पूरी सटीक जानकारी तैयार रखनी होगी।
- आपको एक ‘Code of Ethics’ ड्राफ्ट करना होगा और उसे अपनी वेबसाइट के फुटर में पब्लिश करना होगा ताकि हर पाठक उसे देख सके।
- Ministry के डिजिटल पोर्टल पर जाकर आपको अपने न्यूज़ पब्लिकेशन की बेसिक जानकारी भरनी होगी और रजिस्ट्रेशन फॉर्म सबमिट करना होगा।
List of Document (ज़रूरी दस्तावेज़):
- Company KYC: पैन कार्ड (PAN Card), GST Certificate (अगर आपके बिज़नेस पर लागू हो), और Company Incorporation Certificate.
- Director IDs: आधार कार्ड (Aadhaar Card) और अन्य सरकारी पहचान पत्र।
- Board Resolution: उस व्यक्ति का नाम, फोन नंबर और ईमेल एड्रेस जिसे आपने आधिकारिक तौर पर Grievance Officer नियुक्त किया है।
- Service Description: आपकी वेबसाइट का लाइव URL, आपके कंटेंट का टाइप, और आप मुख्य रूप से किस भाषा में न्यूज़ पब्लिश करते हैं।
इन बुनियादी नियमों का पालन न करने पर न सिर्फ आपका पोर्टल भारत में ब्लॉक हो सकता है, बल्कि पब्लिशर को भारी कानूनी कार्रवाई (Legal Action) का सामना भी करना पड़ सकता है।
The Subjudice Matter Rule: कोर्ट केस से जुड़ी न्यूज़ पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स के लिए एक और बेहद बड़ा अपडेट हाल ही में आया है जिसे जानना हर पब्लिशर के लिए ज़रूरी है। ANI Media vs Wikimedia (2026) केस में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहतरीन और ऐतिहासिक जजमेंट दिया है।
अक्सर देखा जाता है कि जब कोई गंभीर केस कोर्ट में चल रहा होता है (Subjudice Matter), तो कुछ रसूखदार लोग उस केस पर ऑनलाइन लिखे गए आर्टिकल्स को डिलीट करवाने की कोर्ट से मांग करते हैं। उनका तर्क होता है कि मीडिया ट्रायल से केस पर असर पड़ेगा।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह कड़ा आदेश दिया है कि निचली अदालतें (Lower Courts) किसी भी न्यूज़ प्लेटफार्म या वेबसाइट को तब तक कोई भी कंटेंट हटाने का आदेश नहीं दे सकतीं, जब तक कि उस कंटेंट से कोर्ट की निष्पक्ष कार्यवाही पर कोई ‘बहुत बड़ा और सीधा खतरा’ न हो।
यह फैसला भारत के डिजिटल मीडिया और खोजी पत्रकारों (Investigative Journalists) के लिए एक बहुत बड़ी कानूनी जीत है। इसका सीधा मतलब है कि अब कोई भी पावरफुल व्यक्ति या नेता सिर्फ इसलिए आपके न्यूज़ आर्टिकल को डिलीट नहीं करवा सकता क्योंकि उसे वह आर्टिकल या उसमें लिखी सच्चाई पसंद नहीं आ रही है।
Benefit of These New Guidelines (नियमों के असली फायदे)
अगर हम इन सारे बड़े बदलावों और अदालती फैसलों का एक निष्कर्ष निकालें, तो भारत की आम जनता और समाज के लिए इसके कई सकारात्मक Benefit (फायदे) साफ़ दिखाई देते हैं:
- बच्चों की सुरक्षा (Child Protection): OTT प्लेटफॉर्म्स (जैसे Netflix, Amazon Prime, Hotstar) को अब अपने हर कंटेंट पर सही उम्र का लेबल (U/A 13+, A-rated) लगाना होगा। इसके अलावा उन्हें पैरेंटल कंट्रोल (Parental Control PIN) भी अनिवार्य रूप से देना होगा ताकि बच्चे गलत कंटेंट से दूर रहें।
- दिव्यांगों के लिए सुविधा (Accessibility for All): नए ड्राफ्ट रूल्स में यह भी विशेष रूप से कहा गया है कि ऑनलाइन कंटेंट में Closed Captions (CC) और Audio Descriptions होना चाहिए। इसका फायदा यह होगा कि देखने या सुनने में अक्षम लोग भी न्यूज़ और एंटरटेनमेंट का पूरा लाभ उठा सकेंगे।
- फर्जी पोर्टल्स पर लगाम: वो लोग जो सिर्फ भ्रामक हेडलाइंस, क्लिकबेट (Clickbait) और झूठ के सहारे रातों-रात पैसा कमाते हैं, उनके दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। आने वाले समय में सिर्फ क्वालिटी और सच्ची पत्रकारिता का ही इंटरनेट पर दबदबा रहेगा।
Frequently Asked Questions (FAQs)
Q1: What happens when the Supreme Court issues new guidelines for digital news publishers?
Ans: जब Supreme Court issues new guidelines, तो देश की सभी न्यूज़ वेबसाइट्स, OTT प्लेटफॉर्म्स और बड़े न्यूज़ क्रिएटर्स को एक सख्त आचार संहिता (Code of Ethics) का पालन करना होता है। उन्हें फेक न्यूज़ तुरंत इंटरनेट से हटानी पड़ती है और आम जनता की शिकायतों को सुनने के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त करना पड़ता है।
Q2: क्या यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स भी इन नए नियमों के दायरे में आते हैं?
Ans: हाँ, 2026 के नए ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, जो भी क्रिएटर बड़े स्तर पर लगातार करंट अफेयर्स या न्यूज़ को कवर करता है, उसे कानून की नज़रों में एक डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर की तरह ही ट्रीट किया जाएगा और उसे भी सारे रूल्स सख्ती से फॉलो करने होंगे।
Q3: अगर मुझे किसी न्यूज़ वेबसाइट पर कोई फेक न्यूज़ दिखती है, तो मैं एक नागरिक के तौर पर क्या करूँ?
Ans: आप सबसे पहले उस वेबसाइट के आधिकारिक ‘Grievance Officer’ (शिकायत अधिकारी) को ईमेल कर सकते हैं। नए IT Rules के तहत, उन्हें आपकी शिकायत का महज़ 24 घंटे में संज्ञान लेना होगा और 15 दिनों के भीतर एक्शन लेकर आपको जवाब देना अनिवार्य होगा।
Q4: AI (Deepfake) कंटेंट को लेकर सरकार का क्या नया नियम है?
Ans: सरकार और अदालत ने सख्त आदेश दिया है कि अगर कोई भी कंटेंट AI द्वारा जनरेट किया गया है (जैसे किसी नेता या सेलिब्रिटी की झूठी आवाज़ या वीडियो), तो पब्लिशर को उस पर एक स्पष्ट लेबल (AI-Generated Label) लगाना होगा। ऐसा न करने पर क्रिएटर के खिलाफ क्रिमिनल केस भी हो सकता है।
Aakhiri Vichar (Conclusion) & Call-to-Action
भारत की डिजिटल दुनिया इस वक्त बहुत तेज़ी से बदल रही है। जैसे-जैसे तकनीक (Technology) एडवांस हो रही है, वैसे-वैसे इंटरनेट पर धोखेधड़ी और फेक न्यूज़ फैलाने का तरीका भी बदल रहा है। यही मुख्य कारण है कि Central Govt और देश के सुप्रीम कोर्ट को समय-समय पर पुराने नियमों को बदलकर नए नियम लाने पड़ते हैं।
एक ज़िम्मेदार भारतीय नागरिक (Citizen) होने के नाते, हमारी भी यह सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम बिना सोचे-समझे WhatsApp या Facebook पर आए किसी भी भड़काऊ मैसेज को आगे फॉरवर्ड न करें। हमेशा न्यूज़ की सच्चाई को परखें और भरोसेमंद पोर्टल्स से ही सही जानकारी हासिल करें। जो न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स इन सरकारी नियमों का ईमानदारी से पालन करते हैं, वो हमेशा आपके हक़ और सही जानकारी के लिए बेबाकी से खड़े रहेंगे।
क्या आपको लगता है कि इन कड़े नए नियमों के लागू होने से इंटरनेट पर फेक न्यूज़ पूरी तरह बंद हो जाएगी या इससे हमारी आज़ादी कम होगी? अपनी बेबाक राय हमें नीचे कमेंट्स बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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