बकरीद से पहले मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, तमिलनाडु में गाय की कुर्बानी पर पूर्ण प्रतिबंध
तमिलनाडु में गाय की कुर्बानी पर लगा पूर्ण प्रतिबंध: बकरीद से पहले मद्रास हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
दोस्तों, बकरीद का त्योहार नजदीक है और इस मौके पर तमिलनाडु से एक बहुत बड़ी और अहम खबर सामने आई है। मद्रास हाई कोर्ट ने एक बेहद सख्त आदेश जारी करते हुए राज्य में गाय और बछड़े की कुर्बानी पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि चाहे कोई त्योहार हो या आम दिन, तमिलनाडु की सीमा के अंदर कहीं भी अवैध तरीके से जानवरों को काटने की इजाजत बिल्कुल नहीं दी जाएगी। एक न्यूज एडिटर के तौर पर मैंने कई कोर्ट हियरिंग कवर की हैं, लेकिन जिस सख्ती के साथ जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने यह फैसला सुनाया है, वह अपने आप में एक नजीर है। आज हम इस पूरे मामले की कानूनी बारीकियों, पुलिस की गलतियों और प्रशासन की आगे की रणनीति को विस्तार से समझेंगे।
मद्रास हाई कोर्ट का सख्त रुख: आखिर मामला क्या है?
इस पूरे कानूनी घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब कोयंबटूर के रहने वाले के. सूर्य प्रशांत ने मद्रास हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की। उनका सीधा आरोप था कि बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी के लिए राज्य के अलग-अलग हिस्सों में, खासकर पब्लिक जगहों पर अस्थायी शेड (temporary sheds) बनाए जा रहे हैं। याचिका में खास तौर पर थुडियालुर मार्केट, उक्कड़म और सेल्वापुरम जैसे संवेदनशील इलाकों का जिक्र किया गया था, जहां अवैध रूप से जानवरों को काटने की पूरी तैयारी चल रही थी। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह थी कि स्थानीय पुलिस स्टेशन में आधिकारिक शिकायत दर्ज कराने के बावजूद प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया था।
जब मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो राज्य पुलिस ने अपना बचाव करते हुए एक हलफनामा (affidavit) पेश किया। पुलिस ने कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की कि उन्होंने कुर्बानी के लिए कुछ अस्थायी जगहें चिन्हित की हैं, जो पब्लिक एरिया से दूर हैं ताकि ट्रैफिक में कोई दिक्कत ना हो और किसी की भावनाएं आहत ना हों। लेकिन पुलिस की यह दलील उन पर ही भारी पड़ गई।
पुलिस प्रशासन की गलती और कोर्ट की फटकार
पुलिस के हलफनामे को देखकर हाई कोर्ट की बेंच ने कड़ी आपत्ति जताई। जजों ने साफ शब्दों में कहा कि पुलिस या लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसियों के पास अपनी मर्जी से कोई भी अस्थायी शेड या स्लॉटर जोन (slaughter zone) तय करने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाते हुए याद दिलाया कि उनका काम सिर्फ कानून का पालन करवाना है, ना कि अपनी सहूलियत के लिए नए नियम बनाना।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल नगर निगम या स्थानीय निकाय (local bodies) ही कानूनी प्रक्रिया के तहत किसी जगह को स्लॉटरहाउस के रूप में मान्यता दे सकते हैं। पुलिस अपनी तरफ से किसी भी अवैध गतिविधि को लीगल जामा नहीं पहना सकती। यह प्रशासन के लिए एक बहुत बड़ा सबक है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर आप सही तरीका छोड़कर शॉर्टकट नहीं अपना सकते।
संविधान और कानून क्या कहता है? (Article 48)
मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला किसी भावना में बहकर नहीं, बल्कि हमारे संविधान और राज्य के कड़े कानूनों के आधार पर दिया गया है। कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 48 (Article 48) का प्रमुखता से जिक्र किया। यह अनुच्छेद राज्य सरकार को यह जिम्मेदारी देता है कि वह कृषि और पशुपालन को आधुनिक तरीके से विकसित करे। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करे कि गाय, बछड़े और दूध देने वाले अन्य पशुओं की हत्या पर रोक लगे।
इसके अलावा, अदालत ने तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 के नियमों को भी विस्तार से समझाया। इस कानून के सेक्शन 4 के तहत, राज्य में किसी भी गाय या पशु को तब तक नहीं काटा जा सकता, जब तक कि वह कुछ बेहद सख्त शर्तों को पूरा ना करे। वे शर्तें क्या हैं, आइए जानते हैं:
1. उम्र सीमा: जानवर की उम्र कम से कम 10 साल से ज्यादा होनी चाहिए।
2. अनफिट स्टेटस: वह जानवर काम करने या ब्रीडिंग (प्रजनन) के लिए पूरी तरह से अनफिट हो चुका हो। यह स्थिति किसी चोट, बीमारी या बुढ़ापे की वजह से होनी चाहिए।
3. सक्षम अधिकारी का सर्टिफिकेट: सबसे अहम बात, एक अधिकारी ने जानवर की पूरी जांच करने के बाद निर्धारित फॉर्म में एक सर्टिफिकेट जारी किया हो।
कोर्ट ने साफ कर दिया कि अगर निर्धारित फॉर्म में साइन किया हुआ सर्टिफिकेट मौजूद नहीं है, तो किसी भी हाल में परमिशन नहीं दी जा सकती। प्रशासन को इन नियमों का 100 प्रतिशत पालन करना ही होगा।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले: धर्म और नियम का सही तरीका
अक्सर ऐसे मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया जाता है। इस सुनवाई के दौरान भी यह मुद्दा उठा। मद्रास हाई कोर्ट ने इस बहस को हमेशा के लिए शांत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पुराने और ऐतिहासिक फैसलों का सहारा लिया।
जजों ने खास तौर पर 1958 के ‘मोहम्मद हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य’ मामले का जिक्र किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि बहुत से लोग बकरीद के दिन गाय की कुर्बानी नहीं देते हैं। अदालत का मानना था कि इस्लाम में अपने धार्मिक विश्वास को दर्शाने के लिए गाय की कुर्बानी देना कोई अनिवार्य प्रथा (obligatory practice) नहीं है।
इसके साथ ही, 1995 के ‘पश्चिम बंगाल राज्य बनाम आशुतोष लाहिड़ी’ मामले का भी संदर्भ दिया गया। उसमें भी सुप्रीम कोर्ट ने यही तय किया था कि धार्मिक आयोजनों में गाय को काटना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है। हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि भारत में कई मुस्लिम शासकों ने भी अपने शासनकाल में गौहत्या पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी थी। महात्मा गांधी के लिए भी यह एक बेहद संवेदनशील और जरूरी मुद्दा था। इसलिए, धर्म के नाम पर कानून का उल्लंघन करने की कोई भी दलील अदालत में नहीं टिक सकती।
आर्थिक नजरिया: 1976 का सरकारी आदेश और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
इस फैसले की एक और खास बात यह रही कि कोर्ट ने सिर्फ कानूनी या धार्मिक पहलू ही नहीं देखा, बल्कि इसके आर्थिक असर पर भी बात की। अदालत ने तमिलनाडु सरकार के 1976 के आस-पास जारी किए गए एक सरकारी आदेश (Government Order) का जिक्र किया। इस आदेश में साफ लिखा था कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और राज्य में दूध के उत्पादन को बचाने के लिए गायों और बछियों को कटने से रोकना बेहद जरूरी है।
हाई कोर्ट ने प्रशासन को याद दिलाया कि सरकार द्वारा जारी किया गया यह आदेश पूरी तरह से लागू करने योग्य है। प्रशासन इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता। भारत जैसे देश में, जहां खेती और डेयरी उद्योग हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, वहां पशुधन (livestock) की रक्षा करना सिर्फ एक कानूनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारी आर्थिक जरूरत भी है। किसानों की रोजी-रोटी काफी हद तक इन्हीं पशुओं पर निर्भर करती है, इसलिए सही रणनीति बनाकर इनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।
आम जनता और प्रशासन के लिए क्या हैं नए नियम?
अगर आप तमिलनाडु में रहते हैं या इस फैसले का असर समझना चाहते हैं, तो कुछ बातें बिल्कुल साफ होनी चाहिए:
1. कोई अस्थायी व्यवस्था नहीं: गली-मोहल्ले, खुले मैदान या किसी भी अस्थायी शेड में जानवरों को काटना अब पूरी तरह से गैरकानूनी है।
2. केवल मान्यता प्राप्त बूचड़खाने: नगर निगम या स्थानीय निकाय द्वारा आधिकारिक रूप से अप्रूव किए गए स्लॉटरहाउस में ही यह काम किया जा सकता है।
3. सर्टिफिकेट अनिवार्य: अगर किसी जानवर (जिसपर बैन नहीं है) को काटना है, तो हेल्थ गाइडलाइंस और फिट/अनफिट सर्टिफिकेट के बिना यह संभव नहीं है।
4. तुरंत पुलिस एक्शन: अगर कोई नागरिक अपने इलाके में अवैध रूप से जानवरों को कटते हुए देखता है, तो वह तुरंत पुलिस को सूचना दे सकता है। कोर्ट के आदेश के बाद अब पुलिस को बिना किसी देरी के एक्शन लेना ही होगा।
आगे की रणनीति: सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी
मद्रास हाई कोर्ट के इस कड़े आदेश के बाद, तमिलनाडु के मुख्य सचिव (Chief Secretary) और पुलिस महकमे के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती है। अदालत ने तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज एक्ट 1998 के सेक्शन 113 का हवाला देते हुए साफ कर दिया है कि नियमों का उल्लंघन किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने सरकार के आला अधिकारियों और एडीजीपी (लॉ एंड ऑर्डर) को सीधा निर्देश दिया है कि वे राज्य के सभी जिला मजिस्ट्रेट, एसपी और पुलिस स्टेशन प्रभारियों (SHOs) को सख्त हिदायत जारी करें। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अदालत के आदेश की कोई भी अवमानना ना हो। प्रशासन के लिए अब यह एक टेस्ट की तरह है। त्योहार के दौरान शांति बनाए रखने के नाम पर पुलिस अब किसी भी अवैध गतिविधि को नजरअंदाज नहीं कर सकती। कोर्ट ने प्रशासन से जवाबदेही तय करने के लिए कंप्लायंस रिपोर्ट भी मांगी है, ताकि यह देखा जा सके कि ग्राउंड लेवल पर इस आदेश को कितनी सख्ती से लागू किया गया है।
निष्कर्ष: कानून का राज सबसे ऊपर
कुल मिलाकर देखा जाए तो मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला देश के कानूनी सिस्टम में एक बहुत मजबूत संदेश देता है। यह फैसला साबित करता है कि चाहे कोई भी त्योहार हो, या प्रशासन पर कितना भी दबाव हो, कानून के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। अप्रूव किए गए बूचड़खानों के बाहर किसी भी जानवर को काटना गैरकानूनी है, और गाय या बछड़े के मामले में तो यह प्रतिबंध पूरे राज्य में बिना किसी छूट के लागू होता है।
अब सबकी निगाहें तमिलनाडु सरकार और पुलिस प्रशासन पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि अधिकारी इस ऐतिहासिक फैसले को जमीन पर उतारने के लिए क्या सिस्टम और सही तरीका अपनाते हैं। एक बात तो तय है कि यह फैसला सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में देश भर में अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए एक बड़ा कानूनी हथियार साबित होगा। कानून का राज हर हाल में कायम रहना चाहिए, और हाई कोर्ट ने इस बात पर अपनी पक्की मुहर लगा दी है।




